Rohtas: 70 वर्ष के उम्र में देते है निःशुल्क शिक्षा, जानिए कौन है मुनमुन दुबे

Sasaram Munmun Dubey News
-अपने आवास पर बच्चों को पढ़ाते मुनमुन दुबे।

रोहतास पत्रिका/सासाराम:

कर्म व सेवा मानव जीवन का मूल कर्तव्य माना जाता है। इसका नौकरी या पेशे से कोई संबंध नहीं है। इस कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं रोहतास के सेवानिवृत्त संस्कृत शिक्षक मुनमुन दूबे। 8 साल पहले श्रीशंकर उच्च माध्यमिक विद्यालय तकिया (सासाराम) से 2013 में सेवानिवृत्त होने के बाद से आज तक दुबे अपने सेवा धर्म को नहीं भूल पाएं हैं। 70 वर्ष की उम्र में भी अपने आवास पर छात्राओं को हिदी और संस्कृत की नि:शुल्क शिक्षा दे रहे हैं। श्री दुबे का मानना है कि हिदी व संस्कृत शिक्षा और संस्कृति का आधार है, जिससे बच्चों को संस्कार तथा शिष्टाचार का ज्ञान मिलता है।

श्री दुबे ने बताया कि, सेवानिवृत्त होने के बाद भी पांच वर्षो तक संविदा पर अंबेडकर आवासीय विद्यालय रामेश्वरगंज व पिछड़ा वर्ग प्लस टू स्कूल मोकर में सेवा दी। इसके बाद शहर के रामा रानी जैन बालिका उमावि में नि:शुल्क अध्यापन कार्य कर लड़कियों को संस्कृत व हिदी की शिक्षा दी। कोरोना महामारी के कारण वे पिछले छह माह से अपने निजी आवास पर गुरुकुल लगा शिक्षा दान कर रहे हैं। उनका मानना है कि शिक्षा के अदान-प्रदान का कभी अंत नही होता है।शिक्षा ही एक ऐसा धन है जिसको बाटने से बढ़ता है। 

मुनमुन दूबे ने बताया कि, हिदी व संस्कृत शिक्षा का मूल आधार है। वर्तमान समय में लोग इससे विमुख होते जा रहे हैं। समाज को इसका दुष्प्रभाव प्रभाव भी देखने को मिल रहा है। बच्चों का जितना शैक्षणिक और नैतिक विकास होना चाहिए, वह नहीं हो पा रहा है। श्री दुबे बेटियों के भागीदारी को मजबूत बनाने के लिए इन दोनों विषयों की नि:शुल्क शिक्षा देते हैं। उन्होंने इसका मूल उद्देश्य समझाते हुए बताया कि, संस्कृत व संस्कृति को किसी तरह बचाए रखना हमारा मूल कर्तव्य है। श्री दुबे ने कहा कि, कोई भी इच्क्षुक छात्रा बेझिझक गुरुकुल में आकर पठन-पाठन कर सकती हैं।